कोरोना से बिगड़े हालात को देखते इस देश में शव को दफनाने की जगह दाह संस्कार पर जोर


कोरोना के कारण अपनों को ठीक से अंतिम विदाई भी न दे पाने के मलाल तो सभी को है, लेकिन अमेरिकी इस कारण शवों को दफनाने की जगह दाह संस्कार को तरजीह दे रहे हैं, ताकि परिजनों की राख को ही संजोकर उन्हें ताउम्र याद कर सकें या बाद में पूरे तौरतरीकों से उनकी विदाई कर सकें।


नेशनल फ्यूनरल डायरेक्टर्स एसोसिएशन के प्रवक्ता डच नाई ने कहा कि हमने कोविड काल के बाद से यह बदलाव देखा है। काफी संख्या में लोग दाह संस्कार कर शव की राख पाना चाहते हैं। दाह संस्कार में परिजन दूरदराज खड़े होकर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर सकते हैं औऱ यात्रा के लिए कई जगहों पर जाने की जरूरत भी नहीं होती है। इस कारण भी इसे अपनाया जा रहा है। जबकि दफनाने की प्रक्रिया में शव को ताबूत में रखकर साथ ले जाने, प्रार्थना सभा और कब्रिस्तान में उन्हें तयशुदा जगह पर अंतिम विदाई में एक साथ लोगों के इकट्ठा होने की इजाजत नहीं है।




दाह संस्कार में शव बेहद ऊंचे तापमान पर जलाए जाने के बाद राख परिजनों को सौंप दी जाती है। जबकि पार्थिव शरीर को दफनाने से पहले लेपन की जरूरत होती है, जिस पर डब्ल्यूएचओ ने प्रतिबंधित कर रखा है। परिजन पीपीई किट पहनकर भी लेपन का जोखिम लेकर नहीं चाहते कि परिवार में किसी और को खो देने की नौबत आए। 


नाई ने कहा कि दाह संस्कार की प्रक्रिया कम समय में निपट जाने से भी महामारी के दौर में ज्यादा अपनाई जा रही है। ऐसी एक भट्टी में रोज आठ दाह संस्कार हो सकते हैं।जबकि शव को ताबूत में रखने, प्रार्थना सभा और कब्रिस्तान तक ले जाने में चार से छह घंटे का वक्त लगता है।


दाह संस्कार की प्रक्रिया में खर्च भी दफनाने के मुकाबले 50 फीसदी तक कम है। दफनाने में शव को लेपन, विशेष ताबूत तैयार करने, कब्र खोदने से लेकर कंक्रीट का ढांचा तैयार करने तक चार से पांच हजार डॉलर है। जबकि दाह संस्कार की प्रक्रिया को 1600 डॉलर में पूरा किया जा सकता है। आर्थिक तंगी को देखते हुए भी परिजन इसे अपना रहे हैं। 

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