कर्नाटक
कर्नाटक में 'पहले पीरियड' के दौरान घर और पड़ोस की औरतें लड़की की आरती उतारती हैं और गाने गाती है। उसके बाद लड़की को तिल और गुड़ से बनी डिश चिगली उंडे खाने के लिए दी जाती है। माना जाता है कि इसे खाने से पीरियड में खून का बहाव बिना किसी रुकावट के होगा। इस दौरान पूजा में चढ़ाए जाने वाले नारियल और पान के पत्ते घर आए मेहमानों को दिए जाते हैं।
तमिलनाडु
यहां पर 'पहले पीरियड' के दौरान निभाई जाने वाली परंपरा कर्नाटक से बिलकुल अलग है। यहां की परंपरा बड़े स्तर पर, ठाठ-बाट से मनाई जाती है। इस परंपरा का नाम 'मंजल निरट्टू विज्हा' है। ये रस्म किसी शादी के समारोह की तरह ही अदा की जाती है। इस दौरान लड़की को सिल्क की साड़ी पहनाई जाती है।
असम
असम में 'पहले पीरियड' के दौरान निभाई जाने वाली परंपरा को 'तुलोनी बिया' कहा जाता है। इस दौरान लड़की परिवार से अलग एक कमरे में रहती है, जहां पुरुषों को जाने की मनाही होती है। पुरुष चार दिन तक न उस कमरे में जा सकते हैं और न ही उस लड़की का चेहरा देख सकते हैं। दो जोड़ा छाली को लाल कपड़े में बांधकर पड़ोसी के यहां रख दिया जाता है। सात विवाहित महिलाएं (जो विधवा न हो) लड़की को नहलाती हैं। फिर वह पड़ोसी के घर में रखी छाली की पूजा करती है। लड़की को दुल्हन की तरह गहनें और जोड़े पहनाकर सजाया जाता है।
केरल
'पहले पीरियड' के शुरुआती तीन दिन तक लड़की को सबसे अलग रहना होता है। उसे एक ऐसे कमरे में रखा जाता है जहां एक दिया (लैंप) जल रहा हो। उस दिये के पास पीतल के एक बर्तन में नारियल के फूल रखे जाते हैं। माना जाता है कि उस फूल में जितनी कलियां खिलेंगी लड़की को उतने बच्चे होंगे।

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