भारत के ये 3 शहीद जो आज भी करते हैं सरहदों की रखवाली


सभी जानते हैं कि हमारे जवान किन कठिन हालात में पर्वतीय इलाकों में देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए डटे हुए हैं। देश पर सबकुछ न्यौछावर करने के बुलंद इरादे लिए कुछ सैनिक वहां शहीद हो जाते हैं। ऐसे शहीदों में से कुछ आज भी सरहदों की रखवाली कर रहे हैं। गाहे-बगाहे उनकी अदृश्य ताकत का अनुभव होता रहता है। यदि नहीं यदि कोई जवान ड्यूटी में लापरवाही करता नजर आता है तो उसे चपत भी लगाते हैं। इन शहीदों से जुड़ी कुछ रोचक जानकारियां पेश हैं.....

सियाचिन के ओपी बाबा



यह बात 1980 के दशक के अंत की है। तोपखाना(आर्टिलरी) के जवान ओम प्रकाश को सियाचिन के उत्तरी हिमनद (ग्लेशियर) स्थित बिला कॉम्प्लेक्स के मलाऊं पोस्ट पर गश्त लगाने के लिए भेजा गया। अचानक वहां पाकिस्तानियों ने हमला बोल दिया। ओम प्रकाश ने अकेले ही दुश्मन को मार खदेड़ा, लेकिन वापस लौट कर कभी नहीं आए। किसी ने भी न तो कभी उन्हें देखा और न ही उनका शव मिला। इसे एक चमत्कार ही कहा जाएगा कि सैनिकों को सपने में ओम प्रकाश दिखाई देने लगे और वह आने वाली विपत्ति के प्रति पहले ही चेतावनी दे देते।

सियाचिन पर सभी गतिविधियां ओपी बाबा के समक्ष माथा टेक ने के बाद ही शुरू होती है। ओपी बाबा को सियाचिन में सर्वव्यापी माना जाता है। वहां हर चौकी पर ओपी बाबा का मंदिर है और उनकी पहचान दर्शाने वाला लाल झण्डा लगा होता है।

बॉर्डर बाबा (बाबा हरभजन सिंह)



अति ऊंचाई पर तैनाती के एक अन्य स्थान नाथुला में भी 'बॉर्डर बाबा' की जबर्दस्त मान्यता है। मेजर हरभजन सिंह को इस क्षेत्र में 'बॉर्डर बाबा' के नाम से जाना जाता है। बाबा हरभजन सिंह का मंदिर नाथुला और जेलेप-ला के बीच स्थित है। वह  23 पंजाब रेजिमेंट में थे और 1968 में नाथुला (सिक्किम)में तैनाती के दौरान अचानक लापता हो गए। तीन दिन बाद उनका शव मिला और राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया।

बाबा के मंदिर की भी अपनी एक रोचक कहानी है। यहां के लोग कहते हैं कि चार अक्तूबर 1968 को यह सिपाही खच्चरों के एक झुंड को नदी पार कराते समय डूब गया था। कुछ दिनों बाद उसके एक साथी को सपने में हरभजन सिंह(अब बॉर्डर बाबा) ने आकर बताया कि उसके साथ क्या हादसा हुआ था और वह किस तरह बर्फ के ढेर में दब कर मर गया। उसने स्वप्न में उसी जगह अपनी समाधि बनाने की इच्छा जाहिर की। बाद में रेजिमेंट के जवान उस जगह पहुंचे तो उन्हें उसका शव वहीं मिला। तब से वह बाबा हरभजन के नाम से मशहूर हो गया।

शहीद जसवंत रावत 



भारतीय सेना की चौथी गढ़वाल राइफल्स के राइफलमैन जसवंत सिंह रावत ने अरुणाचल प्रदेश (उस समय नेफा) में नुरानांग चौकी पर तीन दिन तक अकेले चीनियों को रोके रखा और बाद में शहीद हो गए। चीनियों को जब पता चला कि अकेले भारतीय सैनिक ने तीन दिन उन्हें रोके रखा तो गुस्से में जसवंत सिंह रावत का सिर काट कर ले गए। जंग के बाद एक चीनी अधिकारी को जसवंत सिंह की बहादुरी की दास्तान का पता चला तो उसने कटा हुआ सिर लौटा दिया और साथ ही पीतल की एक आवक्ष प्रतिमा भी भेंट की।

इसी प्रतिमा को जसवंत सिंह रावत के शहादत स्थल पर रख कर एक समाधि और बाद में मंदिर बना दिया गया। रावत जहां शहीद हुए उस स्थान का नाम अब जसवंतगढ़ है। सैनिकों का विश्वास है कि जसवंत सिंह अब भी सीमा की चौकसी करते हैं। रावत को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। 

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