कानूनी मान्यताए जान लें
देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, दो बालिग (लड़का व लड़की) अगर शादी किए बगैर भी अपनी मर्जी से पारिवारिक-वैवाहिक जीवन जी सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि विधायिका भी लिव इन रिलेशनशिप को वैध मानती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में लिव इन रिलेशनशिप को लेकर एक गाइडलाइंस जारी किया था। इसके मुताबिक जो रिश्ता पर्याप्त समय (लंबे समय) से चल रहा है, इतना होना चाहिए कि वह टिकाऊ माना जा सके, ये कोर्ट तय करेगा। अगर दोनों पार्टनर लंबे समय से अपने आर्थिक व अन्य प्रकार के संसाधन आपस में बांट रहे हों तो ये भी रिश्ता लिव इन ही कहलाएगा।
मनी मैनेजमेंट की बता कर लें
अक्सर देखने को मिलता है की लिव-इन में रहने के बाद लड़का ही सारे खर्चे उठता है! अगर आपको लगता है कि पैसों को लेकर बाद में परेशानियां आ सकती हैं तो पहले ही इस बारे में बातें क्लियर कर लें।
लिव-इन में बच्चे के अधिकार
लिव-इन रिलेशनशिप के माध्यम से पैदा हुआ बच्चा वैध माना जाता है। जिसका अर्थ यह है कि, उस बच्चे की देखभाल की ज़िम्मेदारी उस जोड़े की ठीक उसी तरह होगी जैसी एक शादीशुदा पति-पत्नी की होती है। इसके अलावा कन्या भ्रूण हत्या और गर्भपात से संबंधित सभी प्रावधान और कानून उस बच्चे पर भी लागू होते हैं। इसके साथ ही लंबे समय से लिव-इन में रह रहे कपल्स बच्चे पैदा तो कर सकते हैं, लेकिन ऐसे जोड़ों को बच्चा ‘गोद’ लेने का अधिकार नहीं होता। लिव-इन रिलेशनशिप में पैदा हुए कपल के बायोलॉजिकल बच्चे को पूरे कानूनी अधिकार मिलते हैं।
जब बाहर आना हो लिव-इन रिलेशन से
जो महिलाएं अपने पार्टनर से अलग होती हैं या होना चाहती हैं, वह हर तरह से उनका अपना यानि ‘इंडिविजुअल’ निर्णय होता है। वे किसी भी तरह से, रखरखाव के लिए पैसे यानि गुजारे भत्ते की मांग करने की हक़दार उसी स्थिति में होंगी, जबकि वह लिव इन रिलेशनशिप की बात साबित कर पाती हैं। अन्यथा नहीं।





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