शास्त्रों के अनूसार निषेध है इन घरों का भोजन करना


हमारे हिन्दू समाज में लोग एक-दूसरे के घरों में भोजन करने जाते हैं, एक-दूसरे को भोज पर आमंत्रित भी करते हैं। एक कहावत भी है कि जैसा होवे अन्न वैसा होवे मन। आपने लोगों को कहते सुना होगा कि जैसा भोजन हम करते हैं, हमारे आचार-विचार भी उस दिशा में परिवर्तित होते हैं। गरुण पुराण के अनुसार गरुण पुराण में कुछ ऐसे स्थानों का वर्णन किया है जहां भोजन करने का अर्थ है अपने चरित्र और मस्तिष्क को दूषित करना...

चरित्रहीन स्त्री


चरित्रहीन स्त्री से तात्पर्य ऐसी स्त्री है जो अपनी इच्छा से अनैतिक कृत्यों में लिप्त है। गरुण पुराण के अनुसार जो व्यक्ति ऐसी स्त्री के हाथ से बना भोजन करता है तो वह उसके द्वारा किए जा रहे पापों को अपने सिर ले लेता है।

किन्नरों के घर भोजन


किन्नरों को अच्छा-बुरा, हर व्यक्ति दान करता है इसलिए यह पता लगाना मुश्किल है कि जिस भोजन को ग्रहण किया जा रहा है वह अच्छे व्यक्ति का है या बुरे, इसलिए किन्नरों के घर भोजन करना निषेध है।

क्या होता है दूषित अन्न


अकसर लोग फ्रिज में पड़े बासी खाने या फिर खराब हो चुके अन्न को दूषित कहकर उसका त्याग कर देते हैं, लेकिन हमारे शास्त्रों में दूषित अन्न की परिभाषा अन्य शब्दों में ही दी गई है, जो शायद बहुत हद तक ज्यादा सटीक बैठती है।

Post a Comment

أحدث أقدم