कासपर्स्की लैब की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, " 25.4 प्रतिशत से ज्यादा स्मार्टफोन यूजर्स पॉर्न देखने के दौरान इस मैलवेयर के संपर्क में आए।" रिपोर्ट में 23 प्रकार के मैलवेयर के बारे में बताया गया है, जो अपनी वास्तविक पहचान छिपाने के लिए पॉर्न कंटेंट का सहारा ले रहे थे।
रिसर्च से पता चलता है कि जब यूजर्स किसी अननोन यानी अज्ञात पॉर्न एप्लीकेशन को डाउनलोड करते हैं, तो उन्हें क्लिकर्स का शिकार होने का सबसे बड़ा खतरा होता है। एक बार एप्लीकेशन डाउनलोड होने के बाद, मैलवेयर विज्ञापन वाले एड-लिंक्स के माध्यम से क्लिक करना शुरू कर देता है या फिर यूजर्स के प्रीपेड बैलेंस को काटने के लिए उन्हें WAP की सब्सक्रिप्शन लेने को मजबूर करता है
कंपनी ने आगे बताया कि बैंकिंग ट्रोजन्स (वायरस) पॉर्न वीडियो प्लेयर के रूप में छिपे होते हैं, जो पॉर्न यानी अश्लील मैलवेयर का दूसरा सबसे बड़ा प्रकार है। इस प्रकार के मैलवेयर खासतौर से डिवाइस स्क्रीन को लॉक करता है और यूजर को एक मैसेज दिखाता है कि "डिवाइस पर अवैध कंटेंट (आमतौर पर चाइल्ड पॉर्न) का पता लगाया गया है, और इसलिए डिवाइस को लॉक कर दिया गया है।" जिसके बाद डिवाइस को अनलॉक करने के लिए वायरस के शिकार हुए यूजर को फिरौती का भुगतान करना पड़ता है।

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