अफ्रीकी महिलाओं में एक कहावत मशहूर है, कि लड़की को जिंदगी में तीन मौकों पर भीषण तकलीफ से गुजरना पड़ता है। पहला, जब वो लड़की छोटी होती है और उसका खतना किया जाता है, दूसरा, शादी के बाद सुहागरात और तीसरा मौका जब वो संतान को जन्म देती है। लड़कियों का खतना करने के पीछे एक संकीर्ण पुरुषवादी मानसिकता जिम्मेदार है कि वो लड़की युवा होने पर अपने प्रेमी के साथ यौन संबंध न बना सके. पहला बच्चा होने के बाद पति अपनी पत्नी को अपनी योनि फिर से सिलवाकर बंद करने के लिए बाध्य करता है, ताकि उसकी पत्नी किसी अन्य पुरुष के साथ संसर्ग न कर सके।
अफ्रीका में युवा लड़कियों की शादी तभी होती है,अगर उन्होंने बचपन में खतना करवाया होता है। क्योंकि वहां पर लड़कियों का खतना ही उनके कुंआरे और पवित्र होने का प्रमाण माना जाता है।
उत्तरी मिस्र को अपनी उत्पत्ति का मूल स्रोत मानने वाले एक समुदाय विशेष के लोग महिला खतना को अपनी परम्परा और पहचान मानते हैं। ये समुदाय इस्मायली शिया समुदाय का एक उप समुदाय है,जो सारी दुनिया के साथ साथ पश्चिमी भारत और पाकिस्तान में भी बड़ी संख्या में रहते हैं। यही वजह है कि पश्चिमी भारत और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में स्त्रियों का खतना करने का रिवाज आज भी जारी है। मुस्लिमों के प्रामाणिक इस्लामिक धर्मग्रंथों में स्त्री खतना का जिक्र नहीं है।
कुछ देशों में स्त्री खतना पर शोध करने वाले विद्वानों ने पाया कि बच्ची और माँ के न चाहने पर भी घर की बूढी ओरतें जैसी नानी और दादी अपना रौब दिखाकर या लड़की के बिगड़ जाने का भय दिखाकर जबरदस्ती खतना करवा देती है। लड़कियों का खतना करने के पीछे उनकी परम्परा से चली आ रही मूल मानसिकता यही है कि खतना होने से लड़की सेक्स के मामले में संवेदनहीन हो जाएगी और विवाह से पूर्व किसी भी पुरुष से सेक्स सम्बन्ध बनाने में दिलचस्पी नहीं लेगी। इस प्रथा को मानने वालों का यह भी कुतर्क है कि खतना हो जाने से स्त्री के जननांग ज्यादा साफ-सुथरे रहते हैं। वास्तविक रूप में ये बात बिलकुल गलत है,हर स्त्री अपने जननांगों को अच्छी तरह से सफाई हर रोज स्ययं करती है। कितने दुःख की बात है कि आज भी इस दुनिया के बहुत से लोग अपनी क्रूर और अमानवीय परम्पराओं के साथ प्राचीन युग में ही जी रहे हैं।

إرسال تعليق