बाउंसरों की फैक्ट्री है यह गांव, यहाँ हर लड़का बनता है बाउंसर..!!


दिल्ली के पास असोला फतेहपुर बेरी नाम के दो गाँव हैं। जहां से हर साल एक नहीं दो नहीं बल्कि सैंकड़ों बाउंसर निकलते हैं। इस गाँव को बाउंसर्स का गाँव और बाउंसर्स की बस्ती कहते हैं। इस गाँव मे पहलवानी की शुरुआत विजय पहलवान से हुई जो अभी एक अंगरक्षकों की कंपनी चला रहे हैं। वो गांव में कई युवा लड़कों को पहलवानों बनने के लिए एक प्रेरणा बन गए।


दरअसल दिल्ली एनसीआर में पिछले कुछ सालों से नाईट क्लब, पब और बार का चलन काफी बढ़ा है। इन क्लबों में बाउंसर्स की ज़रूरत पड़ती है। दिल्ली एनसीआर में कई इवेंट्स और शादियों में भी बाउंसर की ज़रूरत होती है। बड़े शहरों में बाउंसर्स की डिमांड धीरे धीरे बढ़ती जा रही है। इसलिए शुरुवात में इस गाँव के कुछ पहलवान लड़के जब बाउंसर बने तो उन्हें अच्छे पैसे मिलने लगे जो इस गाँव के लड़को के लिए बहुत थे।


इस गाँव के लोगों की आर्थिक स्थिति भी ज़्यादा ख़ास नहीं है। गरीब किसानों के बेटों ने किसान बनने से बेहतर बाउंसर बनना समझा। यही कारण है कि अब आने वाली पीढ़ी भी बाउंसर ही बनना चाहती है। इसलिए इस गाँव का हर लड़का बाउंसर है और जो नहीं है वो बाउंसर बनने की ट्रैंनिंग ले रहा है।


इस गाँव के सभी लड़के कसरत करते हैं, और अपने शरीर को मजबूत बनाने के लिए जुटे रहते हैं। गाँव का कोई भी लड़का न शराब पीता है और न ही तम्बाकू खाता है। गाँव के लड़कों के सामने सिर्फ एक गोल है, बाउंसर बनना”। बाउंसर बनने के बाद ना सिर्फ इस गाँव के लड़को की ज़िंदगी बदली है बल्कि दिल्ली एनसीआर के नाईट क्लबों को भी मजबूत बाउंसर मिले हैं।

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