कैलाश पाल का पार्टी नेतृत्व पर आरोप है कि पिछड़ी जातियों को नजरअंदाज कर अगड़ी जातियों पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। उनका कहना है कि संगठन में भी सारे बड़े पद अगड़ी जातियों के नेताओं के पास ही हैं और विधानपरिषद व राज्यसभा चुनावों में टिकट भी अगड़ी जातियों को ही दिया गया। कैलाश पाल बिहार प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं और फिलहाल प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी समिति (वर्किंग कमेटी) में हैं। इस पद से उन्होंने आठ जुलाई को इस्तीफा दिया है, लेकिन यह स्वीकार या अस्वीकार नहीं हुुुुआ है।
पाल का कहना है कि पिछड़ों और अति पिछड़ों की अनदेखी के चलते ही आज पार्टी हाशिये पर है। उनका यह भी कहना है कि अगर अगड़ी जातियों को परंपरागत वोट बैंक बचाने और बढ़ाने के मकसद से बढ़ावा दिया जा रहा है तो फिर राजद से गठबंधन का क्या औचित्य है? राजद से गठबंधन रहते अगड़ी जातियों के लोग पार्टी से कैसे जुड़ सकते हैं? 2015 में महागठबंधन की सरकार में मंत्री बनने से लेकर हालिया राज्यसभा चुनाव तक अगड़ी जाति के नेताओं को ही ज्यादा महत्व दिया गया।
पाल काफी समय से नाराज बताए जा रहे हैं। उन्होंने 8 जुलाई को प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा को इस्तीफे की पेशकश की थी। इसमें उन्होंने पिछड़ी व अति पिछड़ी जातियों की महत्वाकांक्षा को उचित स्थान नहीं दिए जाने को कारण बताया था। साथ ही, कहा था कि पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए समय के साथ बदलना जरूरी है।

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