बताया जा रहा है कि दूल्हे के घर पर ही मंडप सजता है और वहीं सात फेरे होते हैं। दूल्हे के सिर पर न सेहरा होता है और न ही कोई बैंड बाजा। शादी बिलकुल सादे तरीके से होती है। लड़की के माता-पिता न तो अपनी बेटी की शादी में शामिल होते हैं और न ही कन्यादान करते हैं। वे अगले दिन अपने घर से आटा और सब्जियां-दालें और चावल लेकर बेटी के ससुराल जाते हैं। उनके यहां मां अपने हाथ से खाना बनाती है।
बेटी और दामाद को परोसती हैं। शादी समारोह में धाम भी दूल्हा ही देता है। इसके बाद दुल्हन का गृह प्रवेश हो जाता है। वहीं दूसरी ओर यहां तड़क-भड़क के दौर में दुल्हन के परिवार को दहेज, धाम और अन्य खर्चों से बचाने के लिए सदियों से चल आ रही परंपरा आज भी कायम है।शिमला में ऐसी ही हजारों शादियां हो चुकी हैं। हिमाचल के हर क्षेत्र में अपनी-अपनी संस्कृति है। लोग आज भी परैणा विवाह में विश्वास रखते हैं। दुल्हन पक्ष का इसमें कोई पैसा खर्च नहीं होता।
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