आज हम आप को एक ऐसे भारतीय बच्चे के बारे में बताते है। जो की मोगली यानी ऐसा लड़का जिसे जंगल और जंगली जानवरों ने पाला है, वहीं उसके रक्षक हैं, लेकिन मोगली की ये काल्पनिक कहानी सच के काफी करीब भी है,लेकिन हम आज आप को इस मोगली की कहानी के बारे में बताते है जो की असली कहानी है।
बस्तर क्षेत्र के नारायणपुर जिले के चेंदरू मंडावी मुरिया जनजाति का लड़का गढ़बेंगाल गांव का रहने वाला था। आदमखोर जानवर और मोगली की अनोखी दोस्ती की चर्चा ईसाई मिशनरियों के जरिए स्वीडन के ऑस्कर विनर फिल्म डायरेक्टर आर्ने सक्सडॉर्फ तक पहुंची।
सक्सडॉर्फ ने मोगली की अनोखी पर फिल्म बनाने की सोची और पूरी तैयारी के साथ बस्तर पहुंच गए। उन्होंने मोगली को ही फिल्म के हीरो का रोल दिया और यहां रहकर दो साल में शूटिंग पूरी की।
इस फिल्म में 10 साल के मोगली ने बाघों और तेंदुओं के साथ काम किया था और उसकी मजदूरी थी रोज के दो रुपए। फिल्म में दिखाया गया कि मोगली का दोस्त गिंजो एक तेंदुए को मारने के दौरान मारा जाता है, जिसके बाद किसी तरह मोगली की दोस्ती तेंदुओं और बाघों से हो जाती है।
फिल्म को 1958 में कान फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया। 1957 में यह फिल्म रिलीज हुई- 'एन द जंगल सागा', जिसे इंग्लिश में ‘दि फ्लूट एंड दि एरो’ के नाम से भी जाना जाता है।





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