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वास्तव में लहसून और प्याज कोई शापित या धर्म के विरुद्ध नहीं है। इनकी तासीर या गुणों के कारण ही इनका त्याग किया गया है। लहसून और प्याज दोनों ही गर्म तासीर के होते हैं। ये शरीर में गरमी पैदा करते हैं। इसलिए इन्हें तामसिक भोजन की श्रेणी में रखा गया है। दोनों ही अपना असर गरमी के रूप में दिखाते हैं, शरीर को गरमी देते हैं जिससे व्यक्ति की काम वासना में बढ़ोतरी होते है।
ऐसे में उसका मन अध्यात्म से भटक जाता है। अध्यात्म में मन को एकाग्र करने के लिए, भक्ति के लिए वासना से दूर होना जरूरी होता है। केवल लहसून प्याज ही नहीं वैष्णव और जैन समाज ऐसी सभी चीजों से परहेज करते हैं जिससे की शरीर या मन में किसी तरह की तामसिक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिले।। प्राचीन मिस्त्र के पुरोहित प्याज और लहसुन को नहीं खाते थे। चीन में रहने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायी भी
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इन कंद सब्जियों को खाना पसंद नहीं करते। हिंदू धर्म के आधार यानी वेदों में उल्लेखित है कि प्याज और लहसुन जैसी कंदमूल सब्जियां निचले दर्जे की भावनाओं जैसे जुनून, उत्तजेना और अज्ञानता को बढ़ावा देती हैं।

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