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मध्य प्रदेश के उज्जैन के कुछ गांवों में सदियों से ये परंपरा चली आ रही है। इसमें लोग जमीन पर लेट जाते हैं और उनके ऊपर गायों को दौड़ा दिया जाता है। दिवाली के अगले दिन एकादशी पर्व को ये परंपरा निभाई जाती है। इसके पहले लोग अपनी गायों को रंगों से सजाते हैं, फिर अपने गले में माला डालकर रास्ते में लेट जाते हैं। इसके बाद गायों को छोड़ दिया जाता है और वे दौड़ती हुईं लोगों के ऊपर से गुजर जाती हैं।
एकादशी पर्व, छह दिवसीय पर्व है जो कि दीवाली के पहले एकादशी से शुरू होता है। एकादशी से दीवाली तक, पांच दिन गाँव वाले व्रत रखते है। फिर दीवाली के अगले दिन जिन लोगो कि कुछ मनोकामना होती है वो रास्ते पर लेट जाते है और ग्रामीण सजी धजी गायों को उनपर से दौड़ा देते है। कहा जाता है इस तरह से उन लोगो कि मनोकामना अवशय पूर्ण होती है। स्थानीय ग्रामीणों का यहाँ तक कहना कि सदियो से चले आ रहे इस पर्व में आज तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई है।
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