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देवदासियां मंदिरों की देख-रेख, पूजा-पाठ के लिए सामग्री-संयोजन, मंदिरों में नृत्य आदि के अलावा प्रमुख पुजारी, सहायक पुजारियों, प्रभावशाली अधिकारियों, सामंतों एवं कुलीन अभ्यागतों के साथ संभोग करती थीं, पर उनका दर्जा वेश्याओं वाला नहीं था। इसका प्रचलन दक्षिण भारत में प्रधान रूप से था। इस अश्लील तमाशे के पीछे लोगों का यह विश्वास था कि मंदिर में देवदासी के साथ प्रणय-क्रीड़ा करने से गांव पर कोई विपत्ति नहीं आती और सुख-शांति बनी रहती है।
कर्नाटक के बेलगाम में हर वर्ष माघ पुर्णिमा जिसे ‘रण्डी पूर्णिमा’ भी कहते है, के दिन किशोरियों को देवदासियां बनाया जाता है। उस दिन लाखों की संख्या में भक्तजन पहुँच कर आदिवासी लड़कियों के शरीर के साथ सरेआम छेड़छाड़ करते हैं। शराब के नशे में धूत हो अपनी काम पिपासा बुझाते हैं।
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देवदासियों को अतीत की बात मान लेना गलत होगा। दक्षिण भारतीय मंदिरों में किसी न किसी रूप में आज भी उनका अस्तित्व है। स्वतंत्रता के बाद पैंतीस वर्ष की अवधि में ही लगभग डेढ़ लाख कन्याएं देवी-देवताओं को समर्पित की गईं। ऐसी बात नहीं है कि अब यह कुप्रथा पूरी तरह समाप्त हो गई है। अभी भी यह कई रूपों में जारी है।

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